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अल्जाइमर- ने कैसे बदल दिया एक परिवार

श्री सन्नत अपने अंतिम दिनों में  अल्जाइमर रोग से पीड़ित थे| इस बीमारी ने मानो पूरे परिवार का दृष्टिकोण ही बदल दिया | वह 87 वर्ष के थे और रिटायरमेंट के बाद एक लंबे समय से बीमार चल रहे थे| 

अल्जाइमर – जोकि डिमेंशिया का एक रूप है की स्थिति  में मरीज़ की याद्दाश्त कमजोर हो जाती है जिसका सीधा असर दिमाग की कार्यशैली  पर पड़ता है| व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता, रोज़मर्रा की गतिविधियाँ, आदि प्रभावित होती हैं | श्री सन्नत पर इस बीमारी का शुरुआती असर उनकी  65वीं वर्षगांठ पर तकरीबन पूरा-पूरा दिखना शुरू हो चुका था | रिटायरमेंट से पूर्व अपने सफल आईएएस कार्यकाल के दौरान वे तनाव से दूर नहीं रह सकते थे | सोशलाइजिंग और सिविल सर्विसेज के दायरे में वाइन और अपनी सिगार्स के लिये श्री सन्नत का फेनफेयर लोकप्रिय था| 

कुछ लक्षण तो देखने में पास परिवार के लोगों ने महसूस किये| पर एक भूली गयी मीटिंग या किसी को हाई, हल्लो किये बिना आगे बढ़ जाना – कभी उनकी सेक्रेटरी ने ढांप लिया या दूसरे व्यक्ति ने नज़रंदाज़ किया|  अल्जाइमर रोग की गंभीरता को अंडर एस्टीमेट करना परिवार की गलती थी, जिसे याद करके वे अभी भी ग्लानि का अनुभव करते हैं|

काश कि वे कुछ समय निकालते, श्री  सन्नत को इस गुमसुम हालत में जाने से पहले कुछ कदम उठा लेते, डॉक्टरी सलाह लेते| उनके परिवार में पुश्तैनी रूप से यह रोग नहीं था – पर निश्चित रूप से श्री सन्नत को एक बेहतर जीवन-शैली प्रदान की जा सकती थी| एक बेहद जिम्मेदार पूर्व ब्यूरोक्रेट को छोटी-छोटी बातों के लिये दूसरों पर निर्भर देखना- अलबत्ता लिखना- पढना, खाना-पीना जैसे सब व्यवहारों को भूल जाना यह सब उनके परिवार तथा मित्र-जनों के लिये बेहद पीड़ा-जनक था|  

“अल्जाइमर रोग का कोई निश्चित इलाज तो नहीं है और न यह अपने आप से ही ठीक हो जायेगा ”, घरवालों को यह बता दिया गया था | दवाएँ कुछ हद तक लक्षणों को कम  करने में मदद तो कर रही थी जैसेकि नींद, तनाव या घबराहट को कम करना – उन्हें व्यायाम, सुपोषण और अन्य सामाजिक क्रियाकलाप में भी भाग लेने को प्रेरित किया जाता था | वर्षों बाद आज भी उन्हें याद कर, उनके परिवार की आँखें भर आती हैं | 

याद रखे कि इस रोग में दिमाग के टिशूज़ को नुकसान पहुंचने लगता है और आने वाले 10 साल बाद, प्रभावित व्यक्ति में इसके तीव्र लक्षण दिखाई देने लगते हैं- जैसेकि याद्दाश्त कमजोर होना, दिमाग की कोशिकाओं का डी-जनरेट होकर मरने लगना, आदि| शुरुआत में अल्जाइमर के लक्षणों को देखकर अक्सर लोग ऐसा होना उम्र बढ़ने के कारण हो रहा सोचते हैं |  हालांकि इस रोग का कोई संभावित इलाज तो नहीं है, पर इसकी शुरुआती अवस्था में ही निदान के द्वारा रोगी के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है| एक न्यूरोलॉजिस्ट ही समय पर इसकी पहचान कर सकता है| 

बुज़र्गों से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को नज़रअंदाज़ न करें, समय रहते उन्हें समय दें| 

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