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किशोरों में मानसिक रोगों के शुरूआती लक्षण 

आज की तेज़ी से भागती-दौड़ती दुनियां में, मानसिक बीमारियाँ न केवल वयस्कों में बल्कि किशोरों में भी काफी चिंता का विषय बन गयी हैं। मानसिक विकार हमारे मस्तिष्क के क्रिया कलापों से जुड़े हैं और ये आसपास के वातावरण के कई कारकों जैसे सामाजिक, आर्थिक, भावनात्मक व शारीरिक कारकों से प्रभावित हो सकते हैं। प्राचीन समय से, मानसिक अस्वस्थता के साथ कई तरह के लांछन जुड़े हैं और अभी भी हम लोगों के बीच जागरूकता फैलाकर बहुत कुछ जान सकते हैं।

भारत में, 13-15 वर्ष के आयु समूह में हर चौथा बच्चा अवसाद या डिप्रेशन से पीड़ित है। विश्व स्वास्थय संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, 10 दक्षिण ऐश्याई देशों में आत्महत्या करने की दर भारत में सबसे अधिक है। बच्चों में पाए जाने वाले सामान्य मानसिक विकारों में अवसाद, बेचैनी, तंत्रिका विकास, व्यवहारात्मक और आंतरिक विकार शामिल हैं।

ऐसा क्यों हो रहा है? क्या हम उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थय के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध नहीं कर पा रहे हैं?

कारण को समझना

बच्चे के बचपन से वयस्कता की और आगे बढ़ रहे होते हैं, और इस प्रक्रिया में, जिसमें वातावरण में वे रहते हैं उसके जीवन पर व्यापक प्रभाव पढ़ता है। अभिभावकों के बीच की समस्या, स्कूल के साथियों और दोस्तों का दबाव, सभी के अनुकूल होने की आवश्यकता, 95+ अंक लाने का लक्ष्य, पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भाग लेने का दबाव अक्सर बच्चे के दिमाग को प्रेशर कुकर में बदल देते हैं। हैं! इसके साथ-साथ परेशानी तब बढ़ जाती है जब माता-पिता अन्य बच्चों की तुलना अपने बच्चे से करने जाते हैं।

इस सबसे बच्‍चे के अंदर अवसाद पनपता है उसको सकारात्मक विचारों से दूर करता है, मानसिक संतुलन को नुकसान पहुंचाता है। बच्चे माहौल से अत्यधिक प्रभावित होते हैं उनका व्यवहार ज्यादातर उनकी जीवन शैली और परिवेश द्वाratondhरा निर्देशित होता है। इसलिए, यदि आप उनके व्यवहार में कुछ भी असामान्य देखते हैं, तो इसे सामान्‍य न समझें। यहां कुछ चेतावनी संकेत दिए गए हैं जो बच्चों में मानसिक बीमारियों के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।

मानसिक अस्वस्थता का चेतावनी लक्षण

  • एकाग्र न हो पाना या किसी विषय पर ध्यान केन्द्रित न कर पाना
  • अपने अंदर की ताकत की कमी महसूस करना और बाहर जाने की इच्छा न होना
  • दोस्तों को नज़रंदाज़ करना और अलग-अलग रहना
  • मूड में कई तरह के बदलाव जैसे चीखना, चिल्लाना, रोना, गालियाँ देना या डर लगना
  • खाने की असामान्य आदतें (अधिक खाना या भूखे रहना)
  • आत्महत्या के विचार आते हैं या पूरे दिन उदास रहते हैं
  • निर्णय न ले पाना या भ्रम की स्थिति में रहना
  • शराब या मडक पदार्थों की ओर रुझान
  • पढ़ाई कम ग्रेड या फेल होना
  • नींद के अनियमित पैटर्न (अत्यधिक या बहुत कम नींद)
  • अक्सर बुखार, सिरदर्द और शरीर में दर्द की शिकायत होती है
  • शारीरिक प्रारूप को लेकर व्यवहारिक होना चाहिए
  • व्यक्तिगत स्थिति को पूरी तरह से नज़रंदाज़ करना
  • खुद को नक्सान पहुंचाने की कोशिश करना
  • आमतौर पर बोर होना या कुछ भी न करना

बच्चों के साथ जुड़ाव मेइये

यदि आप अपने बच्चों में लम्बे समय तक उपरोक्त में किसी भी तरह का व्यवहार देखते हैं, तो समय बर्बाद किए बिना उपयुक्त कदम उठाइए। अधिकाँश मामलों में, माता-पिता के बीच के परेशानी भरे संबंधों के कारण बच्चों की मानसिक समस्याओं की चपेट में आ जाते हैं। बच्चों के सामने उछाल बहस से, अगर, आप दोनों काम पर जाते हैं तो काम से वापिस आने के बाद उन्हें समय दें ताकि उनके जीवन में संतुलन बना रहे। उनके नज़रिए को बेहतर तरीके से समझने के लिए उन्हें स्वस्थ होने वाली चर्चाओं के लिए प्रेरित करें।

सुनिश्चित करें कि बच्चे को यह समझ है कि वे सुरक्षित स्थान पर हैं और उनके माता-पिता पूरे प्रेम व समर्थन के साथ हमेशा उनके साथ रहेंगे। उन्हें जीवन की ख़ूबसूरत व महत्व के बारे में शिक्षित करें। याद रखें कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और अपने बच्चों के साथ संतुलित आहार खाएं। यदि आपका विचार है कि कोई बच्चा किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है तो समय बर्बाद न करें, और समाधान के बारे में स्वयं न सोच रहा है, बल्कि तुरंत अच्छे मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें।

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