पोस्टपार्टम डिप्रेशन- किसी को न हो !
पोस्टपार्टम डिप्रेशन किसी भी महिला को गंभीर मानसिक आघात पहुंचा सकता है। इस डिप्रेशन के चलते उसे अपने या किसी के प्रति मोह नहीं रहता | उसके इर्द गिर्द विषाद और हताशा के काले बदल घेरा डाल लेते हैं – यह आप बीती मुझसे बेहतर शायद ही कोई जान पायेगा| अपने पहले बेटे की डिलीवरी के तुरंत बाद ही मानो मैं बदल गयी- जहाँ घर में ख़ुशियों का माहौल था, दादा दादी – नाना नानी – सब को जैसे मन की मुराद मिल गयी थी | मैं कुछ खिची खिची सी और उदास मानसिक अवस्था में डूबते चली जा रही थी| यदि मेरी मित्र रमा ने मुझमें आ रहे बदलावों को न समझा होता तो शायद मैं – आज यह ब्लॉग न लिख रही होती , मेरा परिवार बिखर जाता और मैं खुद को नुक्सान पहुंचा लेती | मैंने बेहिचक इसका इलाज करवाया और आज मैं अपने और अपने परिवार के लिये एक खुशहाल जीवन बना पायी|
उम्मीद करती हूँ कि मुझ जैसी कई पोस्टपार्टम डिप्रेशन से गुज़र रही या गुज़र चुकी महिलायें मेरी तरह सही फैसला लेगी और समय पर डॉक्टर से संपर्क करेंगी|
पोस्टपार्टम डिप्रेशन आखिर क्या है ?
पोस्टपार्टम डिप्रेशन कोई आम डिप्रेशन नहीं बल्कि डिलीवरी के बाद डिप्रेशन का एक गंभीर प्रकार है। यह डिप्रेशन डिलीवरी के पहले, दूसरे या तीसरे महीने में कभी भी शुरू हो सकता है और ज़िंदगी को सामान्य पटरी से उतार फेंकता है – नयी मां दु:खी , निराश , खुद को बेकार और दोषी समझने लगती है जोकि इस डिप्रेशन के कुछ साधारण लक्षण हैं । वे किसी भी कार्य या बात में एकाग्रता दर्शाने हेतु या रुचि लेने में मानो असमर्थ हो जाती है। बात इतनी बिगड़ जाती है कि इस डिप्रेशन के चलते वह अपने बच्चे की जरूरतों का भी ध्यान नहीं रख पाती, ममता नहीं दर्शा पाती। उलटे वह नकरात्मक विचारों से घिरी अपने शिशु के स्वास्थ्य को लेकर बहुत संवेदनशील हो जाती है और बार बार या तो उसे छू कर महसूस करती रहती है, अपने डॉक्टर से फ़ोन पर या अपॉइंटमेंट ले कर बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर कोई न कोई सवाल पूछती रहती है | बात यहाँ तक भी बिगड़ सकती है कि वह उसे किसी के द्वारा छूना, खिलाना पसंद न करे |
मुख्यत: नयी नवेली मां बच्चे के जन्म के दो तीन महीने के भीतर इस गंभीर मनोस्थिति की शिकार हो जाती है| ज़रूरी नहीं कि महिला जीवित शिशु को ही जन्म दे – गर्भपात , मृत शिशु को जन्म देने पर भी इस दु:खद परिस्थिति के रिस्क बढ़ जाते हैं |
जिसे मैं बेबी ब्लूज समझती हूँ – वो कहीं पोस्टपार्टम डिप्रेशन तो नहीं ?
बेबी ब्लूज़ एक बेहद सामान्य और होर्मोनेस से सम्बन्धित परिस्थिति है जबकि पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक गंभीर और ध्यान देने हेतु मेडिकल कंडीशन है| इन दोनों में ज़मीन आसमान का फर्क है तथा इनके लक्षण एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न है| हार्मोनल मूड फल्कचूएशंस, और बहुत भावुक हो जाने तक तो बात समझ आती है पर व्यवहार में एक सनक का आ जाना – एक बीमारी है जिससे कि शिशु तथा मां दोनों के ही स्वास्थ्य तथा जान को खतरा हो सकता है | बेबी ब्लूज हॉर्मोन बदलावों के कारण एक परिस्थिति है जोकि हर तीन में से एक महिला में पायी जा सकती है पर यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन की तरह मां को अपनी ज़िम्मेवारियों से विमुख नहीं करती और एक निश्चित अवधि के बाद ठीक हो जाती है | अत: निश्चित कर पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षणों को पहचाने और बेबी ब्लूज़ से कंफ्यूज न करें|
क्या यह स्थिति मेरे हाथ से निकल चुकी है ?
इस डिप्रेशन में वह दुर्लभ पर मुमकिन स्तर भी आ सकता है जब महिला एक अजीब सा व्यवहार करने लगती है, उसे वह आवाज़े सुनायी देने लगती हैं जोकि वास्तविकता में है ही नहीं | वे चीज़े दिखने लगती है – जो केवल वहम है | यह इस डिप्रेशन का एक गंभीर रूप है जिसे पोस्टपार्टम साइकोसिस का नाम दिया गया है | ऐसी अवस्था में वे अपने आस पास के लोगों, अपने शिशु के लिये भी खतरनाक साबित हो सकती है | इस अति को ध्यान में रखते हुये – यह ज़रूरी है कि स्थिति को नज़रअंदाज़ न किया जाये और समय पर इसका इलाज करवाया जाये- यह एक प्रकार की आपातकालीन स्थिति है और ध्यान न दिये जाने पर हाथ से निकल सकती है |
क्या मैं डॉक्टर के पास जाऊँ और कब ?
इस डिप्रेशन का जितना जल्दी हो सके इलाज करवाना आवश्यक है जिससे कि मां और शिशु की सेहत स्वस्थ रहे और वे एक खुशहाल जीवन की नींव पर अपने भविष्य का निर्माण कर सकें| ज़रा सोचिये कि जो बीमारी आपको अपनी जिम्मेवारियां निभाने से वंचित कर सकती है – किसी समय ऐसा भयावह मोड़ भी ले सकती है कि माँ खुद को या शिशु को नुक्सान पहुंचा बैठे , परिवार टूट जाये : क्या इसे नज़रअंदाज़ करना चाहिये?
गर्भवती व नयी माँ दोनों को ही अवसाद के विषय को लेकर सजग तथा चौकस रहना चाहिये|
मेरी सलाह –
- पोस्टपार्टम डिप्रेशन को नज़र अंदाज़ न करें
- इससे बच्चे और महिला के लिए जान का खतरा हो सकता है
- पोस्टपार्टम डिप्रेशन से पीड़ित माँ – अपनी , अपने शिशु तथा परिवार की देखभाल करने में असमर्थ हो जाती है
- इसके सामायिक इलाज से इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है






