कम्पलसिव शॉपर की कहानी
शॉपर एडिक्षन एक ऐसा डिसआर्डर है, जिससे अधिकांश लोग इनकार करते हैं। मैं उनमें से एक हूं।
मैं उन चीजों पर खर्च कर रही हूं, जिन्हें शायद मैं याद भी नहीं करती कि मैंने खरीदा है, जैसे – जूते, इत्र, विभिन्न प्रकार के फर्नीचर, विभिन्न प्रकार के कपड़े और बिना सोचे समझे अचानक खरीदी गई कोई भी चीज जो मुझे पसंद आ जाती है। एक पल के लिए अगर कोई चीज मुझे पसंद आ जाती है, तो मैं तुरंत इसे गूगल करती हूं, इसे ऑनलाइन ट्रैक करती हूं। फिर इससे बचने की कोशिश करती हूं।
जब खरीददारी से बचने की यह निष्क्रिय भावना खत्म हो जाती है, तो मैं अपने कार्ट में इसे फिर से जोड़ लेती हूं। मैं हर चीज की जांच को लेकर सतर्क रहती हूं, मैं लगभग 50 प्रतिषत डिसकाउंट वाली चीजों से अपनी नजरें हटा नहीं सकती हूं। मुझे वह भी चाहिए।
और आप जानते हैं कि मैं अक्सर ऐसी स्थितियों में खुद को पाती हूं। जिस क्षण मैं कुछ खरीदने वाली होती हूं, मेरी नजर उन चीजों पर होती है जिन्हें मैं अगली बार खरीदने वाली होती हूं। जब तक मैं अपनी मनपसंद चीज को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक मुुझे चैन नहीं मिलता। कोई चीज देखते ही लगता है कि इसे खरीदना चाहिए। कभी लगता है शायद नहीं खरीदना चाहिए लेकिन मैं इसे खरीदने को विवष हो जाती हूं।
मैं आज तक अपनी सारी खरीदी हुई चीजों से घिरी हुई हूं और इनका क्या करना है, मुझे नहीं पता। अब मुझमें अलगाव की भावना पैदा हो गई है। कई सालों से, मैंने खुद को कमतर और असहाय महसूस करना शुरू कर दिया है।
मैं कुछ और खरीदना चाहती हूँ ….।
कम्पलसिव बाईंग डिसआर्डर (सीबीडी)
कम्पलसिव बाईंग डिसआर्डर (सीबीडी) एक प्रकार की मानसिक समस्या है। हर खरीद पर, खुषी का अहसास कराने वाला हार्मोन – डोपामाइन खरीददार को और खरीदने के लिए प्रेरित करता है। हर बुरे दिन को खुषहाल बनाने, किसी भावना को छिपाने या खालीपन की भावना को भरने का एकमात्र उपाय षाॅपिंग करना होता है। खरीददारी करने का यह व्यवहार किसी खास संकट का कारण बनता है, यह सामाजिक कामकाज और संबंधों में हस्तक्षेप करता है और इसके अनियंत्रित होने पर वित्तीय समस्याएं भी पैदा होती है।
शॉपिंग डिसऑर्डर से पीड़ित लोग ज्यादातर शॉपिंग के बारे में सोचना बंद नहीं कर पाते हैं। यदि हम इसे चिकित्सकीय भाशा में कहें तो यह अक्सर खरीददारी की भावनाओं को रोकने का एक असफल प्रयास होता है जो सफल नहीं हो सकता है। किसी नशे की तरह उन्हें सभी प्रकार की खरीददारी करनी होती है। कम्पलसिव षाॅपर अपने खर्च के बारे में परिवार से छुपाना षुरू कर देते हैं जिसके कारण परिवार से उनके संबंध खराब हो जाते हैं।
करीब से निरीक्षण करने पर पाएंगे कि कम्पलसिव षाॅपिंग कमोबेश होर्डिंग से जुड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर, वे कई तरह की घड़ियां, ड्रेस, हेयर पिन या जूते खरीद लेते हैं। हालांकि, इन सामानों को एक बार घर ले आने पर, वे सभी एक दराज में डाल दिए जाते हैं जिन्हें कभी भी नहीं देखा जाता है या फिर पहना नहीं जाता है।
ऐसे लोगों की मदद करने के लिए कोगनिटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी), आदि उपलब्ध हंै। सबसे उपयोगी रणनीति यह पहचान करना है कि आपकी खरीदारी क्यों और कैसे एक समस्या बन गई। शालिनी के मामले में उन्होंने कई सालों तक घर से दूर रहने के कारण ऐसा किया। शुरुआत में यह स्वतंत्रता, करियर- जुनून जैसा था। और, बाद में धीरे-धीरे स्वयं को खुष करने और प्रोत्साहित करने के लिए के लिए ऐसा किया।
लेकिन जल्द ही एक कम्पलसिव और पैटर्न बन गया। यदि आप भी उनकी तरह खरीददारी करने वालों में से एक हैं, और आपका इस पर कोई नियंत्रण नहीं है और धीरे-धीरे आप डिप्रेषन में जा रहे हैं या आपको आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो खुल कर बात करने और इलाज कराने में शर्मिंदा महसूस न करें।






